पंख लौटा दो - किताब समीक्षा

अभी लगभग एक महीने पहले इस नए दौर के लेखकों में से मेरे एक प्रिय कवि 'कुणाल झा' की किताब आई, "पंख लौटा दो"। अपर्रिहाय कारणों से मैं उस वक़्त ये किताब नही पा सका, लेकिन इस किताब के लोगों के बीच पहुचने और और हो रही चर्चा से मैं हरपल वाकिफ था। देर से ही सही लेकिन किताब मुझे आज मिल गयी, एक उत्सुक पाठक होने के नाते किताब हाथ मे पड़ते ही घर का एक कोना पकड़ लिया, और बस फिर पन्ने दर पन्ने पूरी किताब खत्म करने के बाद ही उठा।

Pankh Lauta do
 कुणाल जी की ये किताब कई जगहों पर आपको अपनी कविताओं से मोह, प्रेम, प्रकृति, और सामाजिक संवेदनाओ के प्रति अपनी मार्मिक सोच से आपको छू जाएगी। किताब में कई ऐसी कविताएं है जो एक प्रेम में पड़े हुए आशिक़ से लेकर प्राकृत का सुंदर अवलोकन करते कवि से, बचपन में जाकर अपनी माँ से मिलते बच्चे से और सदृढ़ इरादें लेकर बढ़ते हुए जवान को छू कर हमारे और आपके अंदर उतरती है।

 

कुल ५६ कविताओं से सजी ये किताब काफी आसान शब्दों के इस्तेमाल से लिखी गई है। कुणाल जी के नियमित पाठक की नजर से देखे तो चंद कविताये किताब में ऐसी भी हैं जिन्हें पहले भी पढ़ा जा चुका है। लेकिन इस सत्य को भी नही नजरअंदाज कर सकते की ये वो कविताएं हैं जो अमर हैं,और आज के दौर में जिनका कोई सानी नही है। जैसे कि "तुम होती यदि साथ हमारे" या "स्वप्न वो सोये नही हैं" या "ऐसा कोई दिप जलाएं", ये कुछ ऐसी कविताएं हैं जिन्हें शायद एक लेखक के रूप अपनी पहली ही किताब में न रखना शायद बेमानी होती।

 

Pankh lauta do book by kunal
हालांकि किताब बीच मे अपनी कविताओं से पाठक को उतना बांधे नही रख पाती जितना कि अपेक्षा की जाती है, लेकिन जिस तरह से लेखक आपको किताब में वापस ला पटकता है वो काबिले तारीफ है। खासतौर पर कविता "कोसी के प्रति" में कोसी नदी की सुंदरता और वीभत्सता का एक साथ वर्णन, और "सोचता हूं कि बच्चा हो जाऊं" कविता में कवि के मत्स्य प्रेम का उजागर होना। 

एक आलोचक के रूप में आपकी यह किताब कुछ कविताओं में कमजोर होने के बावजूद कुछ नया होने की आस में पाठक को किताब छोड़ने नही देती। और एक प्रशंसक के रूप में यह किताब खूब जचती है और जिन कविताओं से किताब को आखिर तक ले जाया गया है वो जेहन में उतर जाती है। उन सब मे सबसे ऊपर "लोकत्रन्त के देवता"। जो की वर्तमान के देशप्रेमियो को शीशा दिखाती है।

 

यह किताब आज के वक़्त और दौर की पसंद की हिंदी को सहलाते हुए अपने अंदर बेहतरीन कविताएं समेटे हुए है, और जिनसे एक बार रूबरू होना तो बनता है।

इस किताब को आप अमेज़न से खरीद सकते हैं


तारीख: 08.06.2017                                                        अंकित मिश्रा






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