कैमरे का व्यक्तित्व

 

किसी महान व्यक्ति ने दूसरों को प्रेरित करने के लिए कहा था कि “आईने में झांकिए, अपने आप से पूछिये कि बाकी के जीवन में आप क्या करना चाहते हैं और फिर वही करें।"

आजकल काफी लोग आईने के सामने खड़े होते हुए तो नजर आते है, लेकिन हाथों में फोन लेकर। अगर आईना ना हो तो फोन के फ्रन्ट कैमरा का उपयोग करते हुए पाए जाते है, क्यूंकि वह भी तो एक आईना ही है । नहीं?

खैर, आप कौन से आईने में देखना पसंद करते है, ये आप पर निर्भर करता है। कैमरा का उपयोग अधिकतर लोग खुद की फोटो - सेल्फी खींचने के लिए करते है। हमारे देश के प्रधान मंत्री मोदी जी भी अक्सर सेल्फी के लिए चर्चा में रहते है।

यह कहना मुश्किल होगा कि लोग फ्रन्ट कैमरा में देख कर खुद से पूछते होंगे कि वो जीवन में आगे क्या करना चाहते है । लेकिन यह जरूर कहा सकता है यह फोन का एक ऐसा फीचर है जिस पर जाने अनजाने में काफी लोगों का जीवन निर्भर हो चुका हैं।

इंसान अगर अकेला हो और उससे फोटो खींचनी हो तो उसको दूसरे इंसान की मदद नहीं लेनी पड़ती। फ्रन्ट कैमरा ऑन करके खुद ही ले लेता है।

सोशल मीडिया पर आजकल किसी को अपनी राय व्यक्त करनी हो तो वो फ्रन्ट कैमरा की मदद से फटाफट अपना वीडियो बनाकर अपनी बात कह सकता है। यह फीचर सोशल मीडिया सेलिब्रिटी जैसे लोगो के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। उनके रोजगार का ज़रिया भी साबित होता है। इंस्टाग्राम पर स्टोरी डालनी हो या व्हाट्सप्प पर, वीडियो बनाकर या “लाइव ” जाकर, अपना काम किया जा सकता है।

लेकिन कैमरा चाहे फ्रन्ट हो या बैक, जितना फायदेमंद है उतना ही घातक भी। उभरती पीढ़ी के नौजवान हो या बड़े बुढ़े, हमे अक़्सर देखने सुनने को मिलता है कि ये दिनभर सेल्फी और वीडियो के नशे में ही धुत रहते है। 

अगर “लाईक्स” ना मिल पाए, तो ये डिप्रेशन में जाने लगते है। सरकारी नौकरी से कहीं ज्यादा कठिन कॉम्पिटिशन सोशल मीडिया में दिखता है। लाईक्स और सेलिब्रिटी बनने की चकाचौंध में ये बिना सोचे समझे कुछ भी बना कर शेयर करते रहते है। जैसे हमने कुछ दिन पहले ही चीन की बनाई हुई टिकटोक एप्प के केस में देखा था। भारत में गुस्साए हुए लोगों ने इसका जमकर विरोध किया। मसला यह था कि कुछ ही लोग टिकटोक पर क्रिएटिव और ज्ञानवर्धक वीडियो बनाते है और ज्यादातर नौजवान इसे गंदी सोच और अभद्र भाषा का उपयोग करके ‘लाइक और शेयर’ से सुर्खियाँ बटोरने का काम करते है।

इसका विरोध करना भी सही बात है क्यूंकि ना सिर्फ ये आने वाले पीढ़ी पर गलत इम्प्रेशन डालेगा बल्कि ये समय बर्बाद करना का सटीक तरीका है। साफ़ शब्दों में कहा जाए तो खतरनाक पागलपन हैं ।

कैमरा भी अब वही एक बात हों गई जैसे विज्ञान के लिए बचपन में निबंध लिखने को दिया जाता था। “विज्ञान - वरदान या अभिशाप?”(साइंस - बून और बेन?)। कैमरे का व्यक्तित्व अच्छा है या बुरा, यह तय कर पाना इस पर निर्भर करता है कि हम अपने दिमाग का इस्तेमाल किस तरह करते हैं।

 


तारीख: 09.06.2020                                                        अंकिता सेंगर






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