कचौड़ी और चटोरी जीभ

kachauri lekh

कचौड़ी.... हम्म.... मेरा नाम लेते ही मुंह में आ गया न पानी.
आखिर मैं हूँ ही इतनी स्वादिष्ट .... की क्या बच्चे, क्या बुड्ढे और क्या जवान ... जो देखो मेरे स्वाद के दीवाने हैं.

मुझे सबसे पहले किसने और कहाँ बनाया ये तो पता नहीं पर आज देश के घर घर में मेरे चाहने वालों की कमी नहीं है. चाहे बारिश में भीगता मौसम हो या सर्दी की सुबह या हो चिलचिलाती गर्मी... हर ठेले पर मुझे ही पाओगे.

मुझे बनाने के लिए भी हुनर चाहिए जनाब, ऐसे ही मैं खस्ता नहीं बन पाती. सबसे पहले तो मेरे दोस्त मैदे से दोस्ती करनी पड़ती है और उसे बड़े प्यार से देसी घी के मोयन से गूंथा जाता है. अब बारी आती है भरने की.यहाँ कभी कभी मतभेद हो जाता है क्योंकि किसी को आलू की, किसी को प्याज की, किसी को दाल की, तो किसी को मोठ की कचौड़ी पसंद है. यही नहीं कुछ लोग  मुझे आलू की सब्ज़ी, कुछ खट्टी मीठी चटनी के साथ, कुछ दही के साथ, तो कुछ मोठ के साथ मेरा आनंद लेते हैं . लेकिन जो मुझे निस्वार्थ प्रेम करते है वो मुझे किसी भी रूप में पसंद करते है.

वैसे मेरा स्वाद बताने में नहीं बल्कि खाने में पता चलता है. मुझे खाकर तुम्हारी जीभ उत्तेजित हो जाती है और फिर चाहे अमीर हो या गरीब मुझे चाट चाट कर अपने भुक्कर होने का प्रमाण देते हैं. और ठेले पर लगी भीड़ और कड़ाई से बाहर आने तक का बेसब्री से इंतज़ार, मेरे प्रति प्रेम को दर्शाता है.

मुझे खरीदते या खाते हुए यदि कोई परिचित, पड़ोसी या रिश्तेदार मिल जाए तो तुम्हे शिष्टाचार का अभिनय करना पड़ता है. मेने कई बार अपने प्रेमियों को मुझे खाने का निवेदन करना या जबरदस्ती मेरा  भुगतान करना, देखा है.

जब कोई मुझे बड़े प्रेम और स्वाद से खाता है तो मेरा मन ख़ुशी और आनंद से भर जाता है और गर्व से मेरा सीना फूल जाता है ... इसलिए तो मैं फूली फूली रहती हूँ.

कई लोग तो मेरे सामने मेरी बुराई करते है मुझे ऑयली और अनहेल्दी कहते है और मेरे खिलाफ अफवाह फैलाते है लेकिन इन्ही लोगों को मेने चुपके चुपके और उंगलियां चाटते हुए देखा है. और पकड़े जाने पर अपनी सफाई में कहते सुना है की, "भई आज ही खा रहा हूँ."

लेकिन लॉक डाउन के चलते मेरे प्रेमी तरस गए है, मैं भी अपने चटोरे प्रेमियों से मिलने को बेकरार हो रहा हूँ. पता नहीं अब कब हमारा मिलन होगा. कुछ महिलाये तो अपनी पाक कला का प्रदर्शन देने के लिए मुझे बनाने का प्रयास कर रही है, लेकिन सच तो यही जो स्वाद मेरा बाहर ठेले पर खाने में है वो घर के खाने में नहीं. श्श.... धीरे बोलो अभी जो मिल रहा है उसी के चटकारे लो नहीं तो इससे भी हाथ धो बैठोगे. अच्छा बाय! ... देखो, कब, गली के किस मोड पर, हमारी मुलाकात होती है...
    
 


तारीख: 08.07.2020                                                        मंजरी शर्मा






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