कुछ तो \"लोग\" कहेंगे, \"लोगों\" का काम है कहना

 

मनुष्य एक सामजिक प्राणी है, हमारी सरंचना भी इसी समाज में हुई है... हम सभी इसी समाज का हिस्सा है, और इस समाज में रहने वाले लोगों की हमें ज़्यादा परवाह होती है... हमें हमेशा एक डर लगा रहता है की "लोग" क्या कहेंगे.... लेकिन हम भूल जाते हैं की हमारे दुखों में, मुसीबतों में और हमारे संघर्षो में ये "लोग" कभी साथ नहीं होते...

अरे! बहु, यह क्या पहना है? लोग क्या कहेंगे? श्रीमती शर्मा ने अपनी बहु को गुस्सा होते हुए कहा.

रिंकू, दसवीं में इतने कम प्रतिशत... लोग क्या कहेंगे? अफसर का बीटा पढ़ाई में फिस्सडी...

अरे! डॉक्टर की औलाद हो कर, तुम शेफ का काम करोगे ...

रीना, तुम्हारी सभी सहेलियों की शादी हो गई.. तुम कब करोगी? पड़ोस वाली आंटी ने, आँखे मटकाते हुए कहा ...

अरे, रमा जी तुम्हारी बहु की शादी को पांच साल हो गए, बच्चे की खुशखबरी कब दे रही है वो...

इस तरह के और भी जुमले हम रोज़ अपने आस पड़ोस, रिश्तेदारों और अपने सहयोगियों से सुनते आते है... ये वे लोग हाँ जिन्हे अपने से ज़्यादा दूसरों की ज़िंदगी में क्या हो रहा है, ज़्यादा चिंता होती है या लोग हमारे    बारे में क्या सोचेंगे, इस बात से ज़्यादा परेशान होते है...

इस तरह की बातें अनजाने में ही हमारे डर का हिस्सा बन जाती है.  हम हर बात को अपनी इज़्ज़त, अपने खानदान और स्टेटस से जोड़ लेते है और सही निर्णय लने की हिम्मत नहीं कर पाते, और अवसाद या डिप्रेशन में चले जाए है, जिसका दुखद परिणाम आत्महत्या भी होता है.

इसी समाज में बदनामी के डर से कई लड़कियां असफल रिश्ते निभाती है और शोषण का शिकार बनती है..

हम पर लोगों के कहने का इतना प्रेशर होता है की हम अपने फैसले खुद-ब-खुद उन्ही लोगों के अनुसार लेने लगते है.

इस तरह की घटनाएं आम लोगों के मन में और भी दबाव व डर को बढ़ाती हैं, जिससे उन्हें भी यही लगता है कि हर छोटे-बड़े निर्णयों में समाज की सोच का भी ख़्याल रखना ज़रूरी है.

इस तरह की घटनाएं आम लोगों के मन में और भी दबाव व डर को बढ़ाती हैं, जिससे उन्हें भी यही लगता है कि हर छोटे-बड़े निर्णयों में समाज की सोच का भी ख़्याल रखना ज़रूरी है.

हमें अपनी सोच स्वयं बदलनी होगी. हमें निर्णय लेने का अधिकार है. अब लोगों की गलत बातों को बर्दाश नहीं करेंगे, उन्हें जवाब देने से हिचकिचाएंगे नहीं.

ये समाज के "लोग" हमारी मुश्किलों में कभी साथ नहीं देंगे. आप चाहे सही करे या गलत, ये "लोग" हर बात पर कमेंट करेंगे. इसलिए आपको जो सही लगता है आप करें, अपने निर्णय के आप स्वयं ज़िम्मेद्दार होंगे.

लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर हम अपनी या अपने बच्चों की ख़ुशियां, उनके सपनों को छोड़ नहीं सकते, वरना यह डर हमारे बाद हमारे बच्चों के दिलों में भी घर कर जाएगा और यह सिलसिला चलता ही रहेगा.

हमें क्या करना है, कैसे करना है यह हमें ही तय करना है. हां, दूसरों की सहायता ज़रूर ली जा सकती है. अगर कहीं कोई कंफ्यूज़न है तो… लेकिन आखिर में रास्ता हमें ही निकालना है.


तारीख: 03.07.2020                                                        मंजरी शर्मा






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