
यदा कदा सुरों में तान फूंकने वाले
कहां गए बुतों में जान फूंकने वाले
कहां छुपे हुए हैं दुश्मने जहां मेरे
कहां छुपे हुए हैं कान फूंकने वाले
चले गए वो खुशी में शुकर अदा कर के
गमों के दौर में जाहान फूंकने वाले
पता चला ये कि ना थे कभी अंधेरों के
ना रौशनी के थे बागान फूंकने वाले
शिनाख्तों में बला के बदल गए थे वो
मरे पड़े थे यूं खादान फूंकने वाले
मारूफ आलम