
विवाह प्रस्ताव आते ही, खुशी का ठिकाना ना रहा था।
माता-पिता के रोने का अब, कोई बहाना न रहा था।
बहाना तो बस अब रोने का, विदाई में ही आएगा,
वह भी होंगे आँसू खुशी के, क्योंकि बेटी का संसार बस जाएगा।
बेटी की खुशी का भी अब, पैमाना न रहा था,
उसे तो मिल रहा था, उसके सपनों का राजकुमार।
जो खुशियों से भर देगा, उसका सारा संसार।
कहाँ जानती थी, अब सात जन्मों वाला वह जमाना न रहा था।
जिसे मान चुकी थी अपना देवता,
वह देवता भी अब उसका दीवाना न रहा था।
छोड़ गई थी जो गुड़िया अपने खिलौने वाली,
आ गई थी खेलने उससे अब, उसी की दुलारी।
उसके सिवा जीने का, अब बहाना न रहा था।
कहाँ जानती थी, वह जान भी हो जाएगी पराई,
जो उसके जीने की वजह बनके थी आई।
उससे ही नहीं, देश से भी उसकी हो जाएगी विदाई,
फिर भी माँ की खुशी का ठिकाना न रहा था।
बेटी की खुशी के आगे, कोई बहाना न रहा था।।