
डिस्पोजेबल ग्लास
और टी बैग वाली चाय,
मेरे 'टाइप' की नहीं है
मुझे पसंद ही नहीं है
मेरे लिए तो तुम चूल्हे पर पतीला रखना और
पतीले में दो कप पानी,
और फिर उसमें डालना
अपने स्वभाव की तरह तीखे
अदरक के महीन-महीन टुकड़े
फिर उन्हें पकने देना धीमी आंच पर
ताकि तीखापन, मिठास में बदल जाए
अब उसमें डालना बस एक चम्मच
अपने जुल्फों सी रंगत वाली चायपत्ती
और घुलने देना उसके रंग को गरम पानी में
हौले-हौले, आहिस्ता आहिस्ता, देर तलक
ताकि देखने वाले कह न सके
कि पानी में चाय घुली या चाय में पानी
या दोनों एक दूजे में घुले, मिले, एक हुए
और यूं एक हुए कि फिर उन्हें
अलग न किया जा सके
न जोर- जबर्दस्ती से, न किसी चालाकी से
अब थोड़ा और इंतजार करना
फिर अपने बदन की रंगत सा,
दूध डाल देना, मलाई मार के
इसे पकने देना, सीझने देना, घुलने देना
मिलने देना गोरे दूध को, सांवली चाय से
ताकि फिर जो रंग उभरे
वह न चाय का हो, न दूध का
बल्कि वह दोनों का रंग हो
कुछ दूध का, कुछ चाय का
थोड़ा साँवला, थोड़ा गोरा
बोले तो ललछौहां
अब डालना इसमें मिठास का थोड़ा सा एक्स्ट्रा डोज
लेकिन मिल वाली चीनी नहीं, बल्कि कोल्हू वाला गुड़
ताकि चाय में केमिकल नहीं, देसीपन मिले
कृत्रिम सफेद चीनी नहीं बल्कि प्राकृतिक गुड़ घुले
अब इस मिठास को
तिरने देना चाय में
घंटों, महीनों, वर्षों, सदियों तक....
और हां, इस दौरान इसमें
अपनी सांसों सी महकती
इलायची डालना मत भूलना
ताकि चाय सिर्फ जुबान
और पेट को ही न सुहाए
बल्कि मेरी सांसों में खुशबू भी भर दे !!
चाय में हमारे प्रेम सी पवित्र और दिव्य
तुलसीपत्ती डालना, कतई न भूलना
और प्यार के इस पेय को छान लेना कुल्हड़ में
और परोस देना मुझे अपने हाथों से
ताकि मैं तुम्हारी आँखों को देखते हुए
सिप-सिप करके पी सकूं
अलौकिक, दिव्य कुल्हड़ वाली चाय
और जब मैं परदेश वापस जाऊं
तो मुझे याद रहे, अदरक का तीखापन,
इलाइची की खुशबू
और तुलसीपत्ती का पवित्र स्वाद
साथ ही याद रहे कुल्हड़ में छपे
तुम्हारी उंगलियों के अदृश्य निशान
तुम्हारी मदमाती आंखे, लरजते होंठ
और तुम्हारे गांव, तुम्हारे देश की
मिट्टी की खुशबू भी।