गणेश प्राकट्य कथा

गणेश प्राकट्य कथा

 

पार्वती बैठी थीं

कैलाश भवन में शांत,

महादेव दूर ध्यान में थे,

बैठी थीं एकांत।

 

तभी जागी ममता कुछ ऐसी,

बोलीं—मैं माटी के जैसी,

गढ़ सकती हूँ बालक की मूरत,

फूँक देती हूँ प्राण,

जो रखेगा केवल और केवल

मेरा ही ध्यान।

 

फिर क्या था, उबटन लगाया,

उबटन से एक बुत बनाया,

बुत में फूँक दिए फिर प्राण,

सुत के रूप में आ गए

एक बालक बुद्धिमान।

माता ने रख दिया

विनायक उनका नाम।

 

मात की आज्ञा पाकर

बन बैठे वे द्वारपाल,

ध्यान पूर्ण कर जा पहुँचे

अनभिज्ञ पिता महाकाल।

 

पार्वती से मिलने की मनसा से

द्वार खोलने को बोले,

सुत के कड़वे वचनों को

नहीं सह पाए बम भोले।

 

अपने क्रोध की ज्वाला में

कर दिया त्रिशूल प्रहार,

शीश कटा सुत का धड़ से,

मच गया चारों ओर हाहाकार।

माता पार्वती ने तब

ले लिया चंडी का अवतार।

 

उनके क्रोध की ज्वाला से

जलने लगा ब्रह्मांड,

तब महादेव को अपनी त्रुटि का

हो गया था भान।

 

दिया आदेश गणों को—

“ढूँढो एक जीव बुद्धिमान,

जिस पर उसकी माँ का

तनिक न हो ध्यान।”

 

खोजते-खोजते नंदी की

दृष्टि पड़ी एक ओर,

एक नन्हा हाथी का बच्चा

सो रहा था माँ से कोसों दूर।

 

महादेव को सौंप दिया गणों ने

वह गज-बालक विशेष,

बस बालक का शीश लगाना

रह गया था शेष।

 

महादेव ने शीश लगाकर

रख दिया नाम गणेश,

पुत्र को जीवित पाकर माता का

मिट गया सकल कलेश।

 

माता भी पाकर गणेश को

भूल गईं अपना सब क्रोध,

गणेश को भी पिता महाकाल का

हो गया था बोध।

 

माता-पिता के चरणों में

रख दिया अपना शीश,

माता-पिता ने गणेशा को

दे दिया आशीष।

 

माता-पिता की परिक्रमा कर

पाया पद विशेष,

बुद्धि-विवेक के दाता बने

प्यारे बाल गणेश।

 

तभी से बने गणेशा

प्रथम पूज्य भगवान,

विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता को

कोटि-कोटि प्रणाम। 🙏🏻🙏🏻🙏🏻

 

✍🏻 निधि खत्री


तारीख: 28.09.2026                                    निधी खत्री




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