
समय सबको मिला है,
एक वही काल के चौबीस (२४) घंटे।
चाहे लगा लो (सही काम में),
चाहे गवां (बर्बाद) दो,
सबका अपना-अपना विवेक।
कोई कहता है, समय नहीं है,
कोई कहता, काटे नहीं कटता।
कर्मों पर निर्भर करता है,
उसी हिसाब से यह है बँटता।
इसकी कीमत बस वही जानता,
जिसको मिला है इससे नेक।
समय हो या हो समय का साथी,
एक है रथ और दूसरा सारथी।
दोनों निरंतर चलते रहते,
दोनों की नियति है एक। ✍️ निधि खत्री