
उगता सूरज 🌤️कहता है,
मुझको तुम स्वीकार करो।
चलो साथ में मेरे तुम,
और मुझसा व्यवहार करो।
🌤️उगता हूं नित्य सुबह वही।
और 🌥️ढलता हूं नित्य शाम वही।
मैं दाता हूं फिर भी मुझको ,
विलम्ब (देरी )बिल्कुल स्वीकार नहीं।
मेरे पुंज को 💥फिर भी हर कोई,
अपनी सुविधा से लेता है।
पर नियम यही कहता है,
लेने वाला समय संग रहता है। गई✍️ निधि खत्री