
ये जीवन एक मृगतृष्णा है ,
अपनी आकांक्षाएं पूरी करने में ही निकल जाता है ।
एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरी बाहर खड़ी रहती है
ये सिलसिला यूं ही चलता रहता है ।
इस भागम - भाग में कितने रिश्ते छूट जाते हैं
कुछ रूठकर दूर हो जाते हैं ।
जब सब कुछ पाते – पाते थक जाते हैं ,
तब ये होता है एहसास ।
जिसके लिए मैं भाग रहा था
उसकी नहीं अब , मुझे जरूरत ।
खो दिया है मैंने तुम्हें
खो दिया है स्वयं को ।
सच में ये जीवन एक मृगतृष्णा है,
समझ गया हूँ अब , करो परोपकार
जीवन में हो संतोष ,
तभी ये जीवन सार्थक है।
अन्यथा ये जीवन एक मृगतृष्णा है !
ये जीवन एक मृगतृष्णा है ।