ये जीवन एक मृगतृष्णा है

 

ये जीवन एक मृगतृष्णा है ,

अपनी आकांक्षाएं पूरी करने में ही निकल जाता है ।

एक इच्छा पूरी होती है,  तो दूसरी बाहर खड़ी रहती है

ये सिलसिला यूं ही चलता रहता है ।

इस भागम - भाग में कितने रिश्ते छूट जाते हैं

कुछ रूठकर दूर हो जाते हैं ।

जब सब कुछ पाते – पाते थक जाते हैं ,

तब ये होता है एहसास ।

जिसके लिए मैं भाग रहा था

उसकी नहीं अब , मुझे जरूरत ।

खो दिया है मैंने तुम्हें

खो दिया है  स्वयं  को ।

सच में ये जीवन एक मृगतृष्णा है,

समझ गया हूँ अब , करो परोपकार

जीवन में हो संतोष ,  

तभी ये जीवन सार्थक है।

अन्यथा ये जीवन एक मृगतृष्णा है !

ये जीवन एक मृगतृष्णा है । 


तारीख: 01.08.2026                                    श्वेता रस्तोगी




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