कृष्णमूर्ति अंतिम दरवाज़ा

मेरे पास

अगर केवल एक ही प्रश्न होता

तो मैं सीधे

तुम्हारे पास चला आता।

लेकिन मेरे पास तो

प्रश्नों की एक पूरी श्रृंखला है

इसीलिए मैं भटकता रहता हूँ —

एक दरवाज़े से दूसरे दरवाज़े तक।

कोई मुझे

'अर्थ' समझाता है

कोई 'सन्दर्भ'

कोई 'एक और अनेक',

तो कोई 'सत्य और असत्य'।

फिर अंततः

मैं पहुँचता हूँ

जे. कृष्णमूर्ति के दरवाज़े पर —

और वहाँ मैं

एकदम स्तब्ध रह जाता हूँ।

मेरी सारी

समस्याएँ, चिंताएँ, संशय —

एकदम

शान्त हो जाते हैं

उसके बाद

मैं आगे नहीं बढ़ पाता —

किसी और दरवाज़े तक।


तारीख: 17.11.2025                                    प्रतीक झा




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