मैं भी उड़ना चाहती हूँ

मैं भी उड़ना चाहती हूँ ,

इस विशाल गगन  में ।

मैं भी छूना चाहती हूँ ,

इन अचल ऊंचे पर्वतों  को।  

मैं भी महसूस करना चाहती हूँ ,

इन शीतल हवाओं को ।  

मैं भी खिलना चाहती हूँ ,

इन रंग बिरंगे फूलों की तरह ।

मैं भी बरसना चाहती हूँ ,

इन बादलों की तरह ।

मैं भी डूबना चाहती हूँ ,

इस पूर्णिमा के चाँद की सुंदरता   में ।

मैं भी उड़ना  चाहती हूँ ,

इन पंछियों की तरह ।

मैं भी सपने देखना चाहती हूँ ,

तुम  सबकी तरह  ।


तारीख: 14.05.2026                                    श्वेता रस्तोगी




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