\"शहर अजनबी, ठोकरें अपनी\"

शहर है नया-नया, भटक रहा हूँ रोज,  

मिल रही हैं ठोकरें, बदल रही है सोच।  

दिख रही हैं नई चीजें, दिख रहे हैं नए लोग,  

हर चेहरा है अजनबी, वो गाँव अब लगे सही।  

 

इमारतें बड़ी-बड़ी, पहले नहीं देखी कभी,  

पेट पालने को छूट गए अपने सभी।  

पर उम्मीद कहती है — रुकना नहीं कभी,  

कदम डगमगाते हैं, पर रुकता नहीं हूँ।  

 

सपनों के पीछे भागता, थकता नहीं हूँ,  

दिल कहता है संघर्ष ही रास्ता बनेगा।  

ये नया शहर ही एक दिन अपना लगेगा,  

शहर चाहे पराया हो, पर मैं हार मानने वाला नहीं,  

सपनों की आग है भीतर — मेरा सफर रुकने वाला नहीं।


तारीख: 02.09.2025                                    गौरव मिश्रा




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